शायद सबके साथ होता है




कभी यूँ ही कोई खुशबू, कोई मौसम, कोई नज़ारा, याद दिलाते हैं पिछले ऐसे ही किसी दिन, किसी पल ,

किसी नज़ारे की. जगह कोई और होता है समय कोई और लेकिन ऐसा लगता है ये जो भी है, ठीक वैसा और उसी
दिन जैसा है.




जैसे -आज की सुर्ख़ धूप और पेड़ से झड़ते पत्तों को देखकर मुझे याद आये वो पतझड़ के मौसम और दिन जब मेरे 8 वीं कक्षा की प्री बोर्ड की परीक्षाएं चल रहीं थी,

दोपहर का शिफ्ट था चूंकि खाना खाकर जाते थे तो बस में बैठे बैठे ऊँघते रहते थे शाळा और घर के बीच रास्ते भर जंगल होने

की वजह से रस्ते भर सूखे पत्ते बिखरे होते थे और जो पेड़ों पर होते थे वे गिरने के लिए ही लहराते थे , वहीँ वापसी में थोड़ी-थोड़ी ठण्ड.

पुरानी यादों के मामले में ऐसा कुछ शायद सबके साथ होता है...या शायद नहीं.l
Originally posted BY - SADHANA DEVI CHAUHAN
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