गाँव के लोग

कोई आया है घर के बहार ,आंगन में खेलते हुए बच्चो से पूछता है –"घर पे कोई मर्द है ?"
उनमे से एक छोटा लड़का सामने आकर -  "मैं हूँ न.."
आदमी - "तुमसे थोड़ा बड़ा ??"
घर में उस समय उपस्थित, बड़ा मर्द जो बच्चों का चाचा था ,अपनी आँगन की बाड़ी में सब्जियां लगा रहा था , उस आदमीं को देख कर  चाचा ने मिटटी की खुदाई करते हुए ही ऊपर देखकर पूछा -

कौन है ?
आदमी - "बिर्रा गांव से आया आया हूँ ."
चाचा - "अच्छा मैं अभी अiतi हूँ  , अंदर आओ बैठो ."
चाचा घर के अंदर जाकर बच्चों चाची को इशारा किया और रसोई से गुड़

और पानी लेकर आता है .

आदमी को पानी और गुड़ देकर फिर पूछता है कि कैसे आना हुआ .


आदमी - "जोगीमत के घर जाना है , अपनी बहन का रिश्ता पक्का करने ,ज़रा बताओ तो कैसा रहेगा 
वहां ?"
चाचा - "जोगीमत मेरा दोस्त है i बहुत ही अच्छा आदमी है .यही पास में ही है उसका घर. चलो मैं तुम्हे उसके घर ले चलता हूँ ." 

बहुत ही छोटा वाक्य है लेकिन बहुत ही अनोखा . किसी को अपने घर


बिना ज्यादा सवाल किये 

के i कहाँ से आये हो ?क्यों आये हो ? कहीं और जाना था तो हमारे यहाँ क्यों आये हो ?

बुलाना  
बिठाना और मान रखने के लिए वो देना जो उस समय घर में उत्तम मिठाई की तरह है ,

बिना ये 
सोचे की क्या ये ठीक है कहीं वो आदमी ये न सोचे की गुड़ और पानी दिया .

ये विचित्रता और व्यवहार केवल गांव में ही  देखी जा सकती है .

काश कि शहरों में भी हर घर में एक छोटा सा गाँव बसता. काश हमारी आनेवाली पीढ़ी भी ऐसे व्यवहार को देख सकते,

अब जिनके विचार में भी ऐसी बात ऐसा निश्छल बर्ताव आना नामुमकिन तो नहीं लेकिन थोड़ा मुश्किल जरूर है.







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Originally posted By Sadhana Devi Chauhan

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